किताब से कुछ अंश

महाविद्याओं के समूह के केंद्रीय चरित्र की बात करें तो एक विलग स्त्रैण – दर्शन का स्वरुप हमारे समक्ष उपस्थित होता है , जो साधारण स्त्रैण गुणों से युक्त हिन्दू देवियों में लगभग अप्राप्य है , यहाँ वह मूलतः नकारात्मक, रहस्यात्मक और मातृत्व हीन गुणों का प्रतिनिधित्व कर रही है । स्त्री ( देवी) यहाँ पतिहर्ता हैं (धूमावती ) , विनाशिनी है (बगलामुखी ) , भयंकर संहारकर्त्री ,अद्वितीय योद्धा (काली ) है। यह देवियों के मातृवत्सल और सौम्य रूप से विलग सामान्य भारतीय समाज के परिमाणों से किंचित अलग रूप में स्त्री और उसके स्त्रीत्व को परिभाषित करता है । जहाँ सामान्य हिन्दू देवियों में पतिव्रता और संतान- वत्सला का रूप स्वीकार्य है , महाविद्याएं इसके ठीक विपरीत अपने पुरुष – सहभागी से उच्च और सम्मानजनक स्थिति में हैं, कभी कभी तो सहभागी पुरुष देवता अत्यंत निकृष्ट दशा में भी दिखाए गए हैं , जैसे काली के पैरों के नीचे शिव की प्रतिमा । थोड़ा और बारीकी से देखने पर कई और चीजें सामने आती हैं , जैसे महाविद्याओं को जो रक्त बलि दी जाती है उसका पुरुष होना अनिवार्य है । काली जो मुण्डमाला धारण करती हैं वह पुरुषों का मस्तक होता है , जबकि स्त्री राक्षसियों की उपस्थिति भारतीय वांग्मय में बहुतायत में है , तो यह सिर्फ तथाकथित राक्षस दमन के निमित्त की जाने वाली क्रिया तो किसी दृष्टिकोण से नहीं लगती । जैसा कि उनके नाम से स्पष्ट है (रतिप्रिया, महारति, महावीर्या , ‘ललित सहस्त्रनाम’ )महाविद्याएं यौन रूप से सक्षम और आक्रामक हैं । वे सामान्य वासस्थान के रूप में श्मशान का प्रयोग करती हैं , उन्हें रक्त और विशेष परिस्थितियों में दूषित रक्त ( अगर आराधक किसी के आकर्षित करने की मंशा लेकर देवी की आराधना कर रहा है तो मासिक धर्म से संगृहीत रक्त का भोग मातंगी देवी की पूजा में अनिवार्य है ) का भोग चढ़ाया जाता है । सामान्य स्थितियों में रजस्वला स्त्रियों को मंदिरों में प्रवेश, मूर्तियों के स्पर्श और कर्मकांडों में भाग लेने को पाप माना है , एवं ऐसे समय में उन्हें अशुद्ध समझा जाता है इसके पीछे सैद्धांतिक अवधारणा स्त्री को ‘क्षेत्र ‘ की तरह समझने की है अर्थात अगर उचित समय पर गर्भधारण नहीं हुआ और प्रकृति के नियमानुसार प्रतिक्षारत डिम्ब (स्त्री प्रजनन कोशिका ) का स्त्री -प्रजनन तंत्र को परित्याग करना पड़ा तो एक तरह से यह मान्यता ख़ारिज होती है जो स्त्री को संतान उत्पति का साधन भर मानती है । यह वही पुरुषवादी धर्म – संस्कार है जो रजस्वला होते ही बालिका को विवाह योग्य घोषित कर देता है एवं विवाहित स्त्री को कुनबे और राज्य के मानव – संसाधन बढ़ाने हेतु संतान उत्पति का यन्त्र अथवा ‘बीजारोपण ‘ के लिए क्षेत्र की तरह देखता है , इससे इतर स्त्री का कोई उपयोग उसे ज्ञात है न मान्य है । वाम – तंत्र का दर्शन इस मासिक चक्र से निर्मित प्राकृतिक अपशिष्ट को पूजित घोषित कर उस सर्वमान्य दर्शन का प्रतिपक्ष रचता है । उसे स्त्री के मातृत्व का सम्मान तो मान्य है परन्तु इससे अलग स्त्री को वह प्रजनन के निमित्त सिर्फ साधन की तरह न देखकर उसके स्वतंत्र अस्तित्व को मान्यता देता है । वह स्त्री के प्रजनन – तंत्र से इतर उसके लिए यौन आनंद की पृष्ठभूमि का आवाहन करता है। वह स्त्री को माता से अलग युद्धप्रिया एवं रतिप्रिया के रूप में मान्यता देता है।

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स्त्री – शुचिता वाद की प्रचंड अवहेलना करके तंत्र का यह सैद्धांतिक प्रतिपक्ष स्त्री की सनातन – उपयोगिता अर्थात संतानोत्पति से अलग उसके अन्य क्षमताओं को केंद्र में रखता है एवं सामाजिक और सौम्य कहे जाने वाले सिद्धातों की अतिवादिता से अवहेलना करके उन्हें असहमति के दूसरे छोर पर ला पटकता है। यह सब विवरण एक संस्कारी हिन्दू व्यक्ति के मन में इस विशेष समूह की देवियों के प्रति एक घृणा मिश्रित भय भावना भरने के लिए पर्याप्त है। कुल मिलकर यह कहना कहीं से अतिशयोक्ति नहीं कि इन महाविद्याओं से गुजरना भारतीय यौनिकता और प्रकारान्तर से भारत में स्त्रैण – दर्शन को एक नई पराकाष्ठा तक ले जाता है । यह समूह शुचिता वादी भारतीय दर्शन का स्पष्ट सैद्धांतिक – कर्मकांडी स्त्री वादी – प्रतिपक्ष है ।

काली

देवी काली कृष्णवर्णी हैं। भयभीत कर देने वाला रूप, लगभग नग्न अथवा अर्धनग्न, चार भुजाएं , मुण्डमाल धारण किये हुए एवं श्मशान भूमि (कहीं – कहीं रणभूमि )में शिव पर आरूढ़ हैं। उनके बाल खुले एवं नेत्र क्रोधाग्नि से दीप्त हैं। यह महाविद्याओं का प्रथम रूप है। शेष सब महाविद्याएं काली से जन्मी या उनका ही रूप ही मानी जाती है। देवी काली पूर्व में बंगाल के अलावा कश्मीर के तंत्र सम्प्रदाय में मुख्य स्थान रखती है, विशेषतः नवीं सदी के लेखक अभिनवगुप्त के तंत्रलोक साहित्य में देवी काली का स्थान प्रधान्यता से आरक्षित है । साधारण शैव मत में देवी प्रकृति के सौम्य स्वरुप पार्वती को शिव की शिष्या के रूप में चित्रित किया गया है परंतु तंत्र संप्रदाय में काली को ही सर्वोच्च मान्यता प्राप्त है। उदाहरण के लिए निर्वाण तंत्र यह कहता है कि ब्रह्मा , विष्णु और शिव देवी काली से ही उत्पन्न हुए हैं , जैसे सागर के जल से बुलबुले उत्पन्न होते हैं, और देवी काली से उनकी तुलना करना पशुओं के चलने से भूमि पर बने चिन्हों में संगृहीत जल से , सागर के जल की तुलना करने जैसा है । काली के चरित्र में कई रोचक बातें हैं । उदाहरणार्थ देवी काली की पूजा तांत्रिक, कापालिक सम्प्रदायों के अलावा सामान्यतः झारखण्ड – बंगाल की डोम एवं हाड़ी जाती में कुलदेवी की पूजा की तरह प्रचलित है । यह दोनों ही जातियां स्थानीय समाज के लिए ‘अछूत’ समझी जाती है, एवं सामाजिक व्यवस्था में इनका कार्य ग्राम में मल -मूत्र की सफाई करना, शव उठाना और मृत पशुओं से उपयोग की सामग्री प्राप्त करना है ।

भारत के अधिकतर क्षेत्रों में बीहड़ के डाकुओं, संगठित चोर – गिरोहों आदि में काली की पूजा प्रचलित है। अब यह दोहराने की आवश्यकता तो रही नहीं कि शूद्र सामान्यतः वे ही लोग हुए जिन्हें संगठित राज्य सत्ता ने पराजित करके शरणागति स्वीकारने के एवज में गांव से बाहर बसाया एवं अनुपयोगी रोगी एवं मृत पशुओं को उन्हें नगर की साफ -सफाई के एवज में भोजन के रूप में देते रहे। भारत में दास प्रथा का यह अद्वितीय और अप्रतिम रूप था, अगर ऐसे संप्रदाय की अधिष्ठात्री देवी कालांतर में भयावह और अपूजित प्रमाणित कर भी दी जाये तो यह किसी प्रकार भी आश्चर्य उत्पन्न करने वाला तथ्य नहीं है। तंत्र में साधना अथवा पूजा की विधि भी सामान्य देवी – देवताओं की पूजा पद्धति से काफी विलग है। यहाँ साधक की आवश्यकता अनुसार देवी पूजा का प्रावधान है। अर्थात पूजा से पहले उद्देश्य चयनित किया जाये फिर उस चयनित उद्देश्य के अनुसार विशिष्ट देवी की पूजा की जाये । तंत्र – साधना में पूजा गोपनीय और रहस्यात्मक होती है जिसमें ‘पंचमकार’ (मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा एवं मैथुन) का सिध्दांत उपयोग में लिया जाता है, एवं इसका स्वाभाविक स्थान शमशान भूमि होती है । सहजिया तांत्रिक संप्रदाय में , परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग विवाह अनिष्ठा (जार कर्म) है । तंत्र संप्रदाय का यह दर्शन हमें प्रचलित / प्रचित भूतवाद और लोकायत दर्शन के समीप ले जाता है जिसपर चर्चा अन्यत्र कहीं करेंगे। अभी देवी काली के चरित्र पर केंद्रित रहना ही उचित है।

काली अर्थात काल की शक्ति , मृत्यु की अधिष्ठात्री । भय , आतंक , अंधकार , उन्माद , आक्रामकता और अन्य तमाम तामसिक गुणों से युक्त एक ऐसी स्त्रैण शक्ति जो आवाहन पर प्रकट होती है, शत्रु पक्ष का संहार करती है, तत्पश्चात शत्रुओं का रक्त – मांस भक्षण करती है , उनका मुण्डमाल धारण करती हैं , शवों पर संभोग एवं उन्मादित नृत्य करती है , अपने अनुचरों के साथ संरक्षित क्षेत्र में निवास करती है । यह सब एक सभ्य – सौम्य संप्रदाय की नायिका देवी के आदर्श चरित्र के लिए आरक्षित भारतीय समाज के सामूहिक मानस में कतई मान्य नहीं है । ऐसी किसी युद्धप्रिय नायिका को अगर सभ्य समाज के साहित्य और भक्ति की परम्परा से विलग कर दिया जाये तो इसमें किसी को भी किंचित भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए ।
उड़ीसा राज्य की एक जनश्रुति के अनुसार महिसासुर की पराजय के लिए देवी दुर्गा के समक्ष एक शर्त है जिसके अनुसार देवी को अपने यौनांग महिसासुर को प्रदर्शित करने होंगे सिर्फ तब ही वह उस असुर को पराजित करने में सक्षम हो सकती है (david kinsley – Tantrik version of divine feminism )। देवी ऐसा ही करती है परन्तु क्रोध के कारण उनका रूप विनाशिनी काली में परिवर्तित हो जाता है एवं यह मानसिक अवस्था ऐसा रूप ले लेती है जिसमें उनके समक्ष जो भी आता है वे उसका संहार कर देती है। तत्पश्चात देवी को शांत करने के लिए शिव को उनके पैरों के समक्ष लेट जाना पड़ता है जिससे देवी हतप्रभ रह जाती हैं और उनका क्रोध विस्मृत हो जाता है ।

हम देख सकते हैं काली सभ्य समाज में स्त्री के वांछित दर्शन का स्पष्ट प्रतिपक्ष है। देवी काली सभ्य समाज की अवमानना का प्रतीक है , बिखरे केश , लगभग नग्न या अर्धनग्न अवस्था , युद्ध और रति में उन्मादपूर्ण आक्रामकता , रक्तपात, उन्मादित नृत्य , कोई स्पष्ट प्रेमी अथवा पति नहीं और लगभग चिढ़ाने की मुद्रा में बाहर निकली जीभ । इन प्रतीकों की भौतिकवादी व्याख्या निसंदेह अकादमीय रूचि की वस्तु हो सकती है परन्तु यह प्रतीकात्मक चित्र अपने आप में एक अलग स्त्रैण भाव – संसार का चित्र दर्शक के समक्ष प्रस्तुत करता है , जिसमें भय है , रहस्य है , आतंक है, अनियंत्रण है, वितृष्णा उत्पन्न करने का सामर्थ्य है परन्तु इन सब से परे सौंदर्य भी है, एक अदम्य ऊर्जा है , उपादेयता से परिपूर्ण उन्माद है , मुक्त स्वतंत्र कामनापूर्ण देह है और अगर दर्शक को भयमुक्त होकर देखने का सामर्थ्य हो तब बहुत गहरा और जटिल आकर्षण है ।

उन्मत , शिव पर आरूढ़ देवी के खुले बाल , रात्रि के अंधकार समान एक भयभीत करने वाला दृश्य उत्पन्न करता है । कई जगह कुछ महाविद्याओं के बाल खुले चित्रित किये जाते हैं जबकि कुछ स्थानों पर कुछ महाविद्याओं के केश बंधे पाये गए हैं । दुर्गा सप्तसती मंदिर नगवा (वाराणसी ) में महाविद्याओं के केश खुले हैं। यह देखने में एक सामान्य बात प्रतीत होती है , पर इसका भी एक गूढ़ और जटिल सामाजिक प्रतीकीकरण से सम्बन्ध है। हम एक दृश्य स्मरण करते हैं । भारत के प्रसिद्द महाकाव्य महाभारत की जगत प्रसिद्द नायिका द्रौपदी को जब खलनायक दुर्योधन के आदेश पर दुःशासन बलपूर्वक सभा में लाने के लिए प्रस्थान करता है तो द्रौपदी रजस्वला होती है , इसका स्पष्ट उल्लेख ग्रन्थ में है , जिसके कारण द्रौपदी के केश खुले होते हैं । उस समय भी यह एक सामान्य सामाजिक नियम था कि मासिक स्राव के समय स्त्री अपने केश खुले रखे । इन्हीं केशों से दुर्योधन द्रौपदी को घसीटकर सभा में लेकर आता है। आज भी कई सामंतवादी परिवारों में विवाहित स्त्री (और अविवाहित भी ) का बाल खुले रखना वांछित स्त्री व्यवहार में नहीं सम्मिलित किया जाता । तो देवी काली एवं अन्य महाविद्याओं का इस प्रकार खुले केश में चित्रित होना जहाँ सामाजिक व्यवस्था से इस समूह के चिरकालिक विद्रोह को दर्शाता है वहीं चिर – कौमार्य से सज्जित मातृत्वहीनता के प्रत्यय को भरपूर बल के साथ समाज के समक्ष रखता है । अतः हम यह मानने को बाध्य होते हैं कि विवाहिता अथवा विवाह संस्था में होने के हर संभावित आशंका से यह समूह मुक्त है। काली का सामान्य वासस्थल/आराधना स्थल शमशान समझा जाता है निश्चित रूप से यह अपने आप में एक प्रतीक है , प्रतीक उस स्थल का जहाँ पांच तत्वों से बनी यह देह अंततः अपनी निर्मिति के लिए उत्तरदायी तत्वों में विलीन हो जाती है । यह कहा जाना कि देवी के संप्रदाय का दर्शन अपने हर कृत्य से पुरातन भारतीय भूतवाद (भौतिकवाद ) की तरफ इशारा करता है अतिश्योक्ति नहीं है।
यहाँ महाभारत के एक और प्रसंग का स्मरण करना उचित है। प्रसंग कुछ इस प्रकार है। महाभारत का युद्ध चल रहा है, बर्बरीक जो महान पाण्डव भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या अहिलवती के पुत्र हैं ( कहीं-कहीं पर मुर दैत्य की पुत्री ‘कामकंटकटा’ अथवा मोरवी के उदर से भी इनके जन्म होने की बात कही गई है , अपनी माता के आदेश से कुरुक्षेत्र की और प्रस्थान करते हैं। बर्बरीक जो बाल्यकाल से ही बहुत वीर और महान योद्धा थे । उन्होंने युद्ध कला अपनी माता से सीखी थी । भगवान शिव से उन्होंने तीन अभेद्य बाण प्राप्त किये थे जो किसी भी लक्ष्य के भेदन में समर्थ थे । बर्बरीक वैसे तो पांडव के पक्ष में सम्मिलित है परन्तु उनकी माता के आदेशानुसार जो भी पक्ष कमजोर होगा बर्बरीक उसी पक्ष से युद्ध में सम्म्लिलित होंगे । यह स्पष्टतः आदिम क़बीलाई साम्यवाद का सिद्धांत है।

कृष्ण को यह सब ज्ञात है वे बर्बरीक की क्षमताओं और उसकी योग्यता से परिचित हैं एवं वे नहीं चाहते कि बर्बरीक कौरव पक्ष से युद्ध करे । वे इस समस्या का हल निकालते हैं । सर्वव्यापी कृष्ण ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक से परिचित होने के बहाने उसे रोकते हैं और यह कहकर परिहास करते हैं कि आप मात्र तीन बाण लेकर युद्ध में सम्मिलित होने आए है। ऐसा सुनने पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को ध्वस्त करने के लिये पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापिस तरकस में ही आयेगा । यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जायेगा। इस पर कृष्ण ने उन्हें चुनौती देते हैं कि इस पीपल के पेड़ के सभी पत्रों को छेद कर दिखलाओ, जिसके नीचे दोनो खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तूणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया । तीर ने क्षण भर में पेड़ के सभी पत्तों को भेद दिया और कृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे दबा था, बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिये अन्यथा ये आपके पैर को आघात करेगा।

कृष्ण ने बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा तो बर्बरीक ने अपनी माता के वचन दोहराते हुए कहा कि वह युद्ध में उस ओर से भाग लेगें जो निर्बल हो और हार की ओर अग्रसर हो। कृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की ही निश्चित है , और तब अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम उनके पक्ष में ही होगा । ब्राह्मण बने कृष्ण बर्बरीक से दान की अभिलाषा करते हैं इस पर वीर बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया कि अगर वो उनकी अभिलाषा पूर्ण करने में समर्थ होगा तो अवश्य करेगा । कृष्ण दान में बर्बरीक का सर माँगते हैं । बर्बरीक कृष्ण को अपना मस्तक काट कर दान में देने को तत्पर होते हैं किन्तु वह कृष्ण का वास्तविक परिचय जानने और महाभारत युद्ध देखने की कामना ज़ाहिर करते हैं । कृष्ण इस दानवीरता से प्रसन्न होकर अपना वास्तविक परिचय देते हैं और उनकी इच्छापूर्ति हेतु उनका कटा सर अमृत छिड़ककर एक ऊँचे स्थान पर रख देते हैं , जिससे कि बर्बरीक महाभारत युद्ध देखने में समर्थ हो जाए । महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद पांडवों में यह विवाद उत्पन्न होता है कि इस विजय का श्रेय किसे दिया जाये , अब चूँकि बर्बरीक एक निष्पक्ष द्रष्टा है उससे यह पूछा जाता है कि युद्ध में विजय का श्रेय किस को जाता है । यह सुनकर बर्बरीक जो जवाब देते हैं वह हमारे इस पूरे प्रसंग को उद्धृत करने के उद्देश्य की महत्ता को प्रमाणित करने में निर्णायक है । बर्बरीक का उत्तर यह होता है – मैंने जो इस युद्ध में देखा वो यह था कि इस पुरे युद्ध में ये धर्मराज, अर्जुन , भीम, नकुल और सहदेव आदि कोई भी योद्धा नहीं था । वहां सिर्फ़ आपका यानी कृष्ण का सुदर्शन चक्र चल रहा था और योद्धा जो आपस में लड़ते दिखाई दे रहे थे परन्तु असल में वो आपके चक्र से कट कर मृत्यु को प्राप्त हो रहे थे। यह बात महाभारत में कृष्ण के चरित्र और बंगाल की लोककथाओं में काली का कृष्ण के अवतार में संहार करने के प्रसंग के आलोक में साधारण सी लगती है, किन्तु राजस्थान में प्रचलित जनश्रुतियों के अनुसार बर्बरीक आगे जो जवाब देता है वह हमारे लिए रूचि और कौतुहल का विषय है । बर्बरीक आगे कहता है कि कृष्ण के सुदर्शन चक्र से कटकर गिरते हुए शीशों के पीछे मैंने द्रौपदी को अपने खुले बालों से घूमते हुए देखा और वो अपने खप्पर में रक्त भर भर कर उस रक्त का पान कर रही थी । बस इसके सिवाय और कुछ भी मैंने नहीं देखा या मैं कहूँगा कि और कुछ वहाँ था ही नहीं ।

यह उत्तर विस्मृत और आश्चर्य चकित कर देने वाला है । एक साधारण राजकन्या का यह कैसा सादृश्य है ? क्या यह कहना अनुचित है कि यह उत्तर उस महान महाकाव्य की रहस्यमयी और बहुचर्चित नायिका द्रौपदी की मिथक साहित्य में उपस्थिति के नए आयाम हमारे सामने रखता है । हम द्रौपदी के चरित्र पर अब नए सिरे से प्रकाश डालें इससे पहले यहाँ इस कथा के एक और आयाम का ज़िक्र करना उचित है । महाभारत की कथा कृष्ण – बर्बरीक प्रसंग में बस इसी बर्बरीक द्वारा तीर से पीपल के पत्तों के विच्छेदन तक रह जाती है । वही जनश्रुतिओं में यह कथा दूसरा रूप लेती है । एक अलग मौखिक परंपरा के अनुसार बर्बरीक के पीपल के पत्रों के विच्छेदन हेतु चलाया गया तीर कृष्ण के पैर पर आधात करता है , जिससे कि वह भाग भेद्य रह जाता है और कालांतर में जब कृष्ण अपने कुल की श्रीहीनता से निराश होकर वन में प्रवास करते हैं तब ‘जरा ‘ नामक निषाद के छोड़े गए तीर से कृष्ण को उसी स्थान पर आघात प्राप्त होता है जिस स्थान को बर्बरीक ने चोटिल कर दिया था , यही कृष्ण की मृत्यु का कारण बनता है ।

अब अगर इस कथा से भौतिकवादी तर्क अलग किये जाएँ तो निष्कर्ष कुछ ऐसा रूप लेते हैं कि नाग और राक्षस कुल के सम्मिलित रक्त का एक प्रतिनिधि (बर्बरीक ) जो अपनी माता से युद्ध शिक्षा लेकर ( उसकी माता स्त्री योद्धा है, जो उसके संप्रदाय में सामान्य बात है ) दुर्बल का साथ देने के प्रण के साथ ( यह स्पष्टत: आदिम साम्यवाद का चिन्ह है , यहाँ यह स्मरण रखना समीचीन है कि इसी दर्शन का एक अनुयायी चार्वाक नामक चरित्र महाभारत युद्ध के बाद युद्धिष्ठिर की आलोचना करता है एवं इस कारण उसे मृत्यु दंड प्राप्त होता है ) उस काल विशेष में उपस्थित है , जो किसी वजह से कृष्ण की मृत्यु का कारण बनता है ( निषाद संप्रदाय भी एक जांगल क़बीला ही था तो यह निष्कर्ष क्यों अनुचित है कि बर्बरीक की हत्या के प्रतिशोध में कृष्ण को किसी निषाद ने मार डाला हो ) । शेष कथा कपोल – कल्पित भी मान लें तो उससे हमारे वस्तुगत निष्कर्षों में कोई अंतर नहीं दिख पड़ेगा।
तारा
महाविद्याओं में दूसरे स्थान पर देवी तारा है । तारा मुख्यतः तिब्बत मूल की देवी है। वहां उनकी पूजा प्राधान्यता से प्रचलित है। तिब्बत के मिथक साहित्य में तारा के इक्कीस रूप बताये गए हैं जिनमें ‘रक्षण’ से लेकर ‘आक्रमण’ तक के युद्ध कौशल को अलग अलग देवी – रूपों के साथ संबद्ध किया गया है, ज़ाहिर है तारा प्रजनन की देवी नहीं है , उनका आवाहन मुख्यतः संभावित खतरों या मृत्यु से रक्षण हेतु किया जाता है । एक शक्ति जिसका मूल गुण – धर्म ही रक्षा है, फिर वह समुद्र के भँवर में फंसी नाव की रक्षा हो या फिर गहन वन जहाँ प्रकाश की एक किरण भी न जा सके वहां आश्रित की जीवन रक्षा हो । यह मूल गुण – चरित्र ‘रक्षा’ तारा के कई अन्य रूपों में शत्रु – संहार का रूप ले लेती है । देवी तारा की आराधना के लिए ईच्छुक व्यक्ति को लाल वस्त्रों में नारी वेश में सज्जित होना आवश्यक होता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि विधिपूर्वक आवाहन के बाद देवी खुद उसमें प्रवेश करती है। उस मनुष्य को यह समझना आवश्यक है कि वह स्त्री – रूप है । जहाँ वैदिक – सैद्धांतिकी में स्त्री में इंद्र की गौहत्या के पाप का अंश विद्यमान है, यहाँ तंत्र में पूज्य भी स्त्री और आराधक को भी स्त्रीत्व का अभ्यास अनिवार्य है।
यह परकाया प्रवेश की मनोवैज्ञानिक घटना का अद्भुत उदाहरण है । यह व्यवस्था परम्परा के रूप में मनुष्यों में पीढ़ी – दर पीढ़ी संचालित होकर स्त्रैण दर्शन को जीवित तो रखती ही है साथ ही साथ भक्त में पुरुष के स्व का नाश करके स्वयं में स्त्री के अस्तित्व को महसूसना एक ऐसी घटना के रूप में सामने आता है जो राजनैतिक रूप से स्त्रैण विचारधारा और संप्रदाय के खत्म हो जाने के बाद भी प्रतीकात्मक रूप से लोक मानस में स्त्री को निरीह, अशक्त और अबला बनाये रखने के प्रत्यय के विरुद्ध खड़ा होता है, शायद यही कारण है कि भारत के अधिकांश हिस्से जहाँ इन महाविद्याओं और मातृकाओं की पूजा प्रचलित है , में अन्य क्षेत्रों के मुकाबले पुरुषवादिता, बलात्कार स्त्री उत्पीड़न और स्त्री द्वेष की घटनाएं कम उपस्थित होतीं हैं ।

तारा के विषय में एक रोचक मिथक – कथा है । यह कथा ‘आचार’ तंत्र में वशिष्ठ मुनि की आराधना उपख्यान में वर्णित है । महर्षि वशिष्ठ देवी तारा को प्रसन्न करना चाहते हैं वे लम्बे समय तक तपस्या करते हैं परन्तु देवी तारा प्रसन्न होकर दर्शन नहीं देती । महर्षि वसिष्ठ असफल होने पर ब्रह्मा से मार्गदर्शन का अनुरोध करते हैं , ब्रह्मा देवी तारा की महिमा का ज़िक्र करते हुए यह कहते हैं कि देवी तारा ही ब्रह्माण्ड का उद्गम है , उनसे ही सृष्टि की उत्पति हुई है एवं विष्णु इसके पालनकर्ता और शिव संहारकर्ता है । तत्पश्चात वे देवी तारा का मंत्र देते हुए महर्षि वशिष्ठ से मन्त्र द्वारा उनका आवाहन करने को कहते हैं । वशिष्ठ असम के कामाख्या मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं एवं ब्रह्मा के दिए तारा – मंत्र द्वारा देवी तारा का आवाहन करते हैं , परन्तु परिणाम पूर्ववत ही रहता है । वशिष्ठ क्रुद्ध होते हैं, वे अपने तपबल के प्रभाव से , तारा को अपनी अवमानना के लिए शापित करना चाहते हैं परन्तु तभी तारा प्रकट होती है और यह कहती है कि यह उनकी पूजा का सही तरीका नहीं है , सही तरीका सीखने के लिए आपको महाचीन (तिब्बत, जो तब शायद चीन से सांस्कृतिक रूप से अधिक जुड़ा हुआ हो इस कारण उसे महाचीन की संज्ञा प्राप्त हो ) प्रस्थान करना चाहिए , वहां जाकर आपको मेरी आराधना के सही तरीके का ज्ञान , विष्णु जो इस वक़्त बुद्ध अवतार में हैं , से ज्ञात हो सकेगा । तदुपरांत वे तिब्बत के लिए प्रस्थान करते हैं । हिमालय के पास उन्हें किंचित निद्रा – किंचित चेतना की अवस्था में एक दृश्य – सा दीखता है जिसमें बुद्ध रूप में विष्णु कई सुन्दर स्त्रियों के साथ नग्न अवस्था में मदिरापान कर रहे होते हैं , और तभी आकाशवाणी होती है ‘यही देवी तारा की पूजा की सही विधि है ‘। आगे वशिष्ठ बुद्ध रूपी विष्णु से मार्गदर्शन की प्रार्थना करते हैं एवं बुद्ध उन्हें ‘पंचमकार’ की अवधारणा से प्रेरित पूजा विधि की शिक्षा देते हैं। वशिष्ठ को ज्ञान देते विष्णु कहते हैं , इस दृश्य जगत में कुछ भी शुद्ध अथवा अशुद्ध नहीं है । पूजा के लिए कोई उचित अथवा अनुचित नहीं है एवं स्त्रियों को सम्मान देना उनकी सत्ता को सर्वोच्च मानना ही देवी का आराधना का मूल है । यह सब ज्ञान प्राप्त कर वशिष्ठ तारापीठ (बीरभूम जिला , बंगाल ) की और प्रस्थान करते हैं एवं वहां जाकर श्मशान साधना कर देवी को प्रसन्न करते हैं , कालांतर में वे सिद्ध ‘साधक ‘ की तरह प्रसिद्धि पाते हैं । आगे की कथा में देवी उनसे वरदान मांगने को कहती हैं और वे उनसे ‘मातृ ‘ रूप में दर्शन देने का आवाहन करते हैं , देवी तारा शिव को गोद में लिटाये मातृ रूप में दर्शन देती हैं । यह प्रतीकात्मक रूप से एक मंगोलियन युद्ध – देवी का हिन्दू संप्रदाय में स्वीकरण के पूर्व किया गया परिवर्तन ही लगता है।

यह मिथक कथा कई निष्कर्षों की तरफ इशारा करती है । उदाहरणार्थ तारा की बुद्ध के साथ संगति , अर्थात यह अकारण नहीं है कि ब्राह्मण संप्रदाय के प्रमुख अधिष्ठाता ब्रह्मा तारा के आवाहन की सटीक विधि नहीं बता पाते, यह प्रमाणित करता है कि तारा मूलतः बौद्ध परम्परा से सम्बन्ध रखती हैं । दूसरा निष्कर्ष यह कि उनकी पूजा विधि की खोज में वसिष्ठ उत्तर की ओर प्रस्थान करते हैं , स्मरण करना होगा कि बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी भी हिमालय क्षेत्र में अवस्थित है और भारतीय दर्शन के पुरोधा श्रीमान देवी प्रसाद चटोपाध्याय भौतिकवादी दर्शन के उद्गम स्थल के रूप में ठीक इसी भौगोलिक क्षेत्र का ज़िक्र करते हैं , इस तथ्य की संभावनाओं और उपस्थित संदेहों को आगे के अध्यायों के लिए छोड़कर हम देवी तारा के इस आख्यान से उत्पन्न निष्कर्षों पर केंद्रित रहते हैं । तीसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष देवी तारा को असम के कामाख्या पीठ और बंगाल के तारा पीठ से संबद्ध करता है और इनकी पूजा विधि में भी उन्मुक्त दैहिक / इंद्रिय आनंद और निषिद्ध तत्वों का समेकन होता है । तंत्र के दर्शन में ’काम’ का अध्यात्म से यह गहरा सम्बन्ध जो साथ – साथ स्त्री की सर्वोच्च सत्ता को स्थापित भी करता चलता है , न्यूनाधिक रूप से सभी महाविद्याओं से सम्बंधित दर्शन का न सिर्फ मूलाधार है अपितु उसकी चरम परिणीति भी है । स्त्रीवाद की इस भव्य शोभायात्रा के देह- गान के इस वर्जित प्रकरण में यह देखना और समझना बहुत आश्चर्यजनक है कि स्त्री की देह का मुक्त होना , प्रकारांतर से पहले परिवार संस्था को , फिर राज्य सत्ता को और फिर सामंतवाद या पूंजीवाद को कैसे सिरे से ध्वस्त करता है, और सिर्फ इसी कारण कैसे यह संगठित हिन्दू – संप्रदाय के बाद के दर्शन में निषिद्ध रूप ले लेता है ।

[यह अंश मेरी पुस्तक “प्राचीन भारत में  मातृसत्ता और यौनिकता ” से उद्धृत है।]

फ्लिपकार्ट लिंक : http://www.flipkart.com/prachin-bharat-men-matrusatta-aur-yaunikata/p/itme6xwmkbftcypz?pid=9789384159221&ref=L%3A-4987546040952602492&srno=p_1&query=lovely+goswami&otracker=from-search

  •  लवली गोस्वामी
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चित्रकार के प्रेम की अकथ कथा – लवली गोस्वामी

सृजन और सरोकार

( अभी फेसबुक पर एक नोट के रूप में लवली गोस्वामी का राजा रवि वर्मा और उनके काम की पड़ताल करता यह महत्त्वपूर्ण आलेख पढ़ने को मिला. आवश्यकता महसूस हुई कि इसे नेट पर सामान्य रूप से उपलब्ध करना चाहिए. इसलिए उनकी अनुमति से यहां उस आलेख की अविकल प्रस्तु्ति की जा रही है. )

चित्रकार के प्रेम की अकथ कथा

raja ravi verma - self potraitकिसी ऐसे चरित्र पर लिखना वाकई मुश्किल होता है जो आपको कहीं प्रभावित करता हो। मनोगतता, भावना अक्सर वस्तुगतता पर भारी पड़ती है और आप निरपेक्ष मूल्यांकन से चूक जाते हैं, इसी एक समस्या के कारन मैं राजा रवि वर्मा पर लिखने से हमेशा बचती रही हूँ । अधिक समय नही बीता है जब किसी फिल्म की वजह से राजा रवि वर्मा का नाम भारत की आम जनता तक पहुंचा, यहाँ मुझे कहना होगा कि हम भारतीय अपनी बौद्धिक सम्पदा को पहचानने और उसे सम्मान देने के मामले में…

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